जाने कि ऐसा क्या है खास वाराणसी के इस प्राचीन इतिहास में, जिसकी आध्यामिकता का जिक्र पुराने लेखों में भी मिलता है?

स्वागत है दोस्तों आप सभी का travelzoa पर, जहां आपको जानने को मिलेगा वाराणसी के इतिहास के बारे में कुछ ऐसे राज जिसकी प्राचीनता और आध्यात्मिकता का जिक्र पुराने लेखो में देखने को मिलता है। संस्कृति से भी पुराने कहे जाने वाले इस शहर के इतिहास के पन्नों को जब हम पलटकर देखते हैं तो इसमें बहुत सारे ऐसे रोचक इतिहास मिलते हैं जिसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की नींव यहां के लोगों में साफ-साफ झलकती है।

हिंदू धर्म की आस्था से जुड़े उत्तर भारत के गंगा तट पर स्थित वाराणसी जिसे काशी से भी संबोधित किया जाता है और साथ ही यहां के लोग इसे भोले बाबा की नगरी, ‘मंदिरों का शहर’, ‘भारत की धार्मिक राजधानी’, ‘भगवान शिव की नगरी’, ‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ इत्यादि नामों से संबोधित करते हैं, जिसे दुनिया की सबसे प्राचीन नगरों के रूप में शुमार किया गया है। इस नगर के बारे में ऐसा कहा जाता है कि हजारों वर्ष पहले कुछ सांवले और नाटे कद के लोगों ने इस जगह को बसाया था जो अब एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विख्यात है। वाराणसी के लोगों का रिश्ता यहां के गलियों, गंगा नदी, श्री कशी विश्वनाथ मन्दिर और यहां के 88 घाटों से इतना अटूट है जिसे शब्दों में बयां कर पाना असंभव है।

about the ancient history of Varanasi
about the ancient history of Varanasi

रघु राय कहते हैं कि, “जो चीज मुझे हमेशा आकर्षित करती है वह यह है कि कैसे लोग हमेशा अपने समय के ताने-बाने में कदम रखते हैं। वाराणसी में प्रत्येक अनुष्ठान लगभग समृद्धि और समग्री का त्योहार है और अपनी संकरी गलियों वाले रास्ते और ऊपर की मंजिलों तक ले जाने वाली सीढि़यां लगी रहती हैं जो अपने आप में एक कहानी बयां करती हैं।”

यहां पर तरह-तरह के धर्मों के लोग एक साथ निवास करते हैं और इसके स्मारकों की बात करें तो यहां पर बहुत सारे ऐसे स्मारक हैं जो सैकड़ों से हजारों साल पुराने हैं जहां राजा महाराजा काल के स्मारक आपको वाराणसी के प्रचलित स्थान गंगा घाट के किनारे मिल जाएंगे जो कि हिंदुओं का एक पवित्र स्थान है। साथ ही यहां 88 घाट मौजूद हैं, जहां का रहन-सहन दुनियाभर में मशहूर है। यहां के प्रसिद्ध स्थलों की बात करें तो यहां सारनाथ जैसे प्रसिद्ध स्थान है जहां महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। वाराणसी के ऊपर पौराणिक कथाओं में बहुत सारी ऐसी चीजें बताई गई है जिसके अनुसार यह लगभग 3000 साल से भी ज्यादा पुराना है जिसमे बहुत सारी संस्कृतियों ने जन्म लिया है।

अमेरिका के एक प्रसिद्ध लेखक मार्क टवेन वाराणसी से इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने एक वाक्य वाराणसी के ऊपर लिखा जो दुनियाभर में प्रचलित है और वह लिखते हैं-

“बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों (लीजेन्ड्स) से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है।”

वर्तमान में इसे हिंदुओं का धार्मिक स्थल और पवित्र शहरों के रूप में जाना जाता है, मगर 12 वीं शताब्दी में इसमें इस्लामिक काल का भी इतिहास मिलता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में बताया जाता है कि वाराणसी की स्थापना हिंदुओं के महान देवता शिव के द्वारा की गई थी और गंगा नदी की भी स्थापना उन्हीं के द्वारा की गई थी। शायद इसलिए ही इस शहर को शिव की नगरी भी कहा जाता है और यहां के लोगों का शिव में आस्था भी इसी कारण से बहोत ज्यादा है।

वाराणसी के प्राचीनता को साबित करने वाले कुछ नामचीन व्यक्ति

पहले के दौर में यहां पर बहुत तरह के प्रभावशाली दार्शनिक, आध्यात्मिक पुरुष, विद्वान और राजा महाराजा इत्यादि लोग रहते थे, जिसकी कहानी आज भी उन स्मारकों में देखने को मिलती है जो घाटों के किनारे मौजूद है। इनमें से कुछ नामचीन व्यक्तियों में वल्लभाचार्य, कबीर, स्वामी रामानंद, त्रैलंग स्वामी, रविदास, शिवानन्द गोस्वामी, जयशंकर प्रसाद, गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, मुंशी प्रेमचंद, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया, गिरिजा देवी, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, पंडित रवि शंकर इत्यादि कई लोग शामिल हैं। शायद इसी वजह से यहां से बहुत से विद्वान निकलकर दुनिया के सामने आए और यह हिंदुओं के लिए शिक्षा और अध्ययन का एक जाना पहचाना केंद्र बना। 

प्राचीन नगरी वाराणसी के नाम का उद्गम

जिस तरह से वाराणसी का इतिहास प्राचीन है, उसी तरह से इसके नाम का उद्गम भी काफी रोचक है। जिसमें जिक्र मिलता है मुगलों का, जहां उन्हें काशी की वास्तुकला काफी ज्यादा प्रभावपूर्ण लगी जिसके लिए उन्होंने इसे “रस” की संज्ञा दी और उन्होंने यह भी कहा कि, “यह शहर मानो ऐसा लगता है कि खुद से बना हुआ हो”, इसके बाद इन दोनों शब्दों को मिलाकर उन्होंने इसे “बनारस” का नाम दे दिया जो आज दुनियाभर में इसी नाम से प्रचलित है। इसके साथ ही वाराणसी के नाम का उद्गम भी काफी रोचक है जहां बहने वाली 2 नदियों “वरुणा” व “असि” के संयोजन से निकले “वाराणसी” का नाम दुनिया के सामने आया और 24 मई 1956 को आधिकारिक तौर पर इस आध्यात्मिक शहर को “वाराणसी” का नाम दे दिया गया। इसके अलावा इस नाम का जिक्र महात्मा बुद्ध के काल के दौर में भी मिलता है।

वाराणसी का रोचक इतिहास

महादेव की नगरी काशी या वाराणसी का इतिहास काफी ज्यादा रोचक से भरा हुआ है जिसमें हिंदू धर्म के अनुसार यह कहा जाता है कि इस नगर की स्थापना हिंदुओं के भगवान शिव ने 5 साल पहले की थी, जिसका उल्लेख हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ स्कंद पुराण, ऋग्वेद, रामायण व महाभारत सहित कई प्राचीनतम वेदों का ग्रंथों में मिलती है और इसी वजह से यहां के लोगों में शिव के आस्था रोम रोम में बसी हुई है, जिसकी कहानी आपको वाराणसी के हर गलियों में दिख जाएगी।

स्कंद पुराण में कहा गया है, “तीनों लोक मेरा एक नगर बनाते हैं। और उसमें काशी मेरा राजमहल है।”

मगर बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि वाराणसी शहर लगभग 3000 साल के लगभग प्राचीन है जहां बहुत सारे संस्कृतियों का वास रहा है और इन्हीं संस्कृतियों की झलक आपको आज के रेशमी कपड़ों, बनारसी साड़ी, शिल्प कला, संगीत इत्यादि चीजों में मिल जाएगी। जिसके कारण यह दुनिया भर में प्राचीन संस्कृति व व्यापार का एक अद्भुत केंद्र बना हुआ है।

ताहिर शाह कहते हैं कि, “ज्ञानोदय, और उसके पहले आने वाली मृत्यु, वाराणसी का प्राथमिक व्यवसाय है।”

इसके अलावा 567 ई.पू. जब गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था उस समय काशी राज्य की राजधानी वाराणसी थी। धार्मिक, शैक्षणिक एवं कलात्मक गतिविधियों के तौर पर प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने वाराणसी को एक महत्वपूर्ण केंद्र बताया है। इस रहस्यमई वाराणसी का वर्णन ईसा पूर्व की छठी शताब्दी के ऐतिहासिक आलेखों में भी देखने को मिलता है जिसमें बताया गया है कि वाराणसी भारतवर्ष का एक बहुत ही समृद्धशाली राज्य होने के साथ-साथ लोगों के लिए एक आध्यात्मिक स्थल भी था। इसके साथ ही मध्य युग की बात करें तो वाराणसी कन्नौज राज्य का एक अभिन्न हिस्सा था जिसपर बंगाल के पाल नरेशों ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

सन् 1194 की बात की जाए तो उस समय वाराणसी के इतिहास के काले पन्नों में शहाबुद्दीन गौरी का नाम शामिल है जिसने इस खूबसूरत शहर को लूटकर उसे काफी क्षति पहुंचाई गई थी। सिर्फ यही नहीं बल्कि वाराणसी के नाम को भी बदलकर मुगल काल में मुहम्मदाबाद रख दिया गया था। इसके अलावा एक और रोचक कहानी का जिक्र मिलता है जिसमें वाराणसी पर अवध का कब्जा था इसमें अंग्रेजों के साथ बलवंत सिंह ने वाराणसी को अवध से मुक्त कराया और यह युद्ध बक्सर के युद्ध के रूप में जाना जाता है। साथ ही अंग्रेजों द्वारा महाराज प्रभुनारायण सिंह को 1911 में वाराणसी के राजा के तौर पर सुशोभित किया गया।

1194 ईस्वी में वाराणसी का उथल-पुथल इतिहास

1194 ईस्वी के दौरान वाराणसी की हालत काफी ज्यादा अव्यवस्थित थी जिसमें मुस्लिम शासकों का जिक्र मिलता है जिन्होंने वाराणसी के मंदिरों को नष्ट कर दिया और यहां के लोगों पर अत्याचार करने के साथ-साथ कब्जा करने के कारण यहां के बहुत सारे विद्वान उनसे डरकर दूसरे जगह पर चले गए। मगर मुगल सम्राट अकबर के काल के दौरान 16वीं शताब्दी में इस शहर की सुंदरता और सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विरासत को समझा और यहां के लोगों को आजादी दी। मगर यह भी काफी दिनों तक ऐसा नहीं रहा क्योंकि इनके वंशज औरंगजेब के काल के दौरान उसने इस आध्यात्मिक शहर और इससे जुड़े मंदिरों व लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया।

मराठों के शासनकाल के दौरान जो कि 17वीं शताब्दी के आस पास था, उस समय वाराणसी की धार्मिक विरासत के साथ-साथ यहां की संस्कृति को संवारा गया और 18वीं शताब्दी में यह रहस्यमई शहर ब्रिटिश शासन में धार्मिक व वाणिज्यिक केंद्र के तौर पर उभरा। भारत में जब ब्रिटिशों का काल आया जो कि 1910 ईस्वी के लगभग था, उस समय ब्रिटिशों ने वाराणसी को भारत के एक नए राज्य के रूप में स्थापित किया जो 1949 ईस्वी तक था क्योंकि उसके बाद स्वतंत्रता सेनानियों की सहायता से ब्रिटिश भारत को छोड़कर चले गए और 1950 में वाराणसी को भारतीय गणराज्य में शामिल कर दिया गया था। तो यह था वाराणसी का बीता कल जिसने अपने अस्तित्व को सैकड़ों सालों के जद्दो जहत से बचाए रखा है, जिसे आप आज के समय में देखते हैं। तो आप समझ ही गए होंगे कि इसे प्राचीन और रहस्यमई शहरों में क्यों शुमार किया जाता है।

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