वाराणसी और बाबा धाम जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों पर हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। देश के अलग-अलग राज्यों के अलावा विदेशों से भी लोग यहां दर्शन, पूजा-पाठ और आध्यात्मिक एक्सपीरियंस के लिए आते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन श्रद्धालुओं की भाषा क्या होती है और वे धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल होने वाली संस्कृत को कितना समझ पाते हैं? इसी विषय पर किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन में कई दिलचस्प तथ्य सामने आए हैं।
बीएचयू के डीएवी पीजी कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. महिमा सिंह और उनकी रिसर्च टीम द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार बाबा धाम और वाराणसी के सात प्रमुख घाटों पर आने वाले श्रद्धालुओं में लगभग 58 प्रतिशत लोग ऐसी 24 अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं जो हिंदी से अलग हैं। वहीं करीब 42 प्रतिशत श्रद्धालु हिंदी भाषी पाए गए। अध्ययन में ये भी सामने आया कि कुल श्रद्धालुओं में से केवल 37 प्रतिशत लोग ही संस्कृत में बोले जाने वाले मंत्रों और धार्मिक श्लोकों का अर्थ समझ पाते हैं।
ये अध्ययन भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के एक मेगा प्रोजेक्ट के तहत किया गया है। रिसर्च का उद्देश्य धार्मिक स्थलों पर आने वाले लोगों की भाषाई विविधता और धार्मिक संवाद की प्रभावशीलता को समझना था। अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं से बातचीत की और उनके धार्मिक अनुभवों, भाषाई पृष्ठभूमि तथा धार्मिक अनुष्ठानों को समझने की क्षमता से जुड़े आंकड़े एकत्र किए।
रिसर्च में सामने आया कि वाराणसी और बाबा धाम जैसे धार्मिक केंद्र वास्तव में भारत की भाषाई विविधता का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, पंजाबी, बांग्ला, उड़िया, असमिया और कई अन्य भाषाएं बोलते हैं। इसके अलावा कुछ विदेशी श्रद्धालु भी अध्ययन का हिस्सा बने, जिनकी मातृभाषा हिंदी या भारतीय भाषाएं नहीं थीं। ऐसे में धार्मिक स्थलों पर भाषा एक महत्वपूर्ण विषय बनकर उभरती है, क्योंकि अधिकांश धार्मिक अनुष्ठान और मंत्र संस्कृत में होते हैं।
अध्ययन के अनुसार संस्कृत को धार्मिक भाषा के रूप में सम्मान तो मिलता है, लेकिन इसके वास्तविक अर्थ को समझने वालों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। कई श्रद्धालु पूजा और मंत्रोच्चार में शामिल होते हैं, लेकिन वे मंत्रों के अर्थ और संदर्भ को पूरी तरह नहीं समझ पाते। शोधकर्ताओं का मानना है कि धार्मिक स्थलों पर स्थानीय और सरल भाषाओं में जानकारी उपलब्ध कराए जाने से श्रद्धालुओं का धार्मिक एक्सपीरियंस और बेहतर हो सकता है।
रिसर्च टीम ने ये भी पाया कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु धार्मिक स्थलों पर उपलब्ध जानकारी को अपनी भाषा में पढ़ना और समझना पसंद करते हैं। कई लोगों ने बताया कि अगर पूजा-पद्धति, धार्मिक महत्व और मंत्रों का अर्थ उनकी अपनी भाषा में उपलब्ध हो, तो वे धार्मिक गतिविधियों से और अधिक जुड़ाव महसूस कर सकते हैं। इससे धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है और श्रद्धालुओं को अधिक सार्थक जानकारी मिल सकती है।
वाराणसी के घाटों पर किए गए अध्ययन में विशेष रूप से ये देखा गया कि यहां आने वाले लोग केवल धार्मिक कारणों से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभवों के लिए भी पहुंचते हैं। कई श्रद्धालु गंगा आरती, मंदिर दर्शन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और स्थानीय परंपराओं को करीब से देखने की इच्छा रखते हैं। ऐसे में भाषा एक ऐसा माध्यम बन जाती है जो लोगों को इन परंपराओं से जोड़ने का काम करती है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 54वें जन्मदिन पर राजेंद्र प्रसाद घाट पर हुआ विशेष आयोजन, मां गंगा का किया गया दुग्धाभिषेक
विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक पर्यटन के बढ़ते दायरे को देखते हुए बहुभाषी सूचना प्रणाली विकसित करना समय की जरूरत है। अगर प्रमुख धार्मिक स्थलों पर अलग-अलग भारतीय भाषाओं में सूचना बोर्ड, डिजिटल गाइड और ऑडियो सहायता उपलब्ध कराई जाए, तो देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं को काफी सुविधा मिल सकती है। इससे धार्मिक स्थलों की पहुंच और प्रभाव भी बढ़ेगा।
डॉ. महिमा सिंह और उनकी टीम का ये अध्ययन धार्मिक पर्यटन, भाषाई विविधता और सांस्कृतिक संवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अध्ययन से ये स्पष्ट होता है कि भारत के प्रमुख धार्मिक केंद्र केवल आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण सामाजिक मंच भी हैं।
रिसर्च के निष्कर्ष बताते हैं कि वाराणसी और बाबा धाम जैसे धार्मिक स्थलों पर भाषाई विविधता बेहद व्यापक है। ऐसे में श्रद्धालुओं तक धार्मिक और सांस्कृतिक जानकारी उनकी समझ की भाषा में पहुंचाना भविष्य में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इससे न केवल धार्मिक अनुभव बेहतर होगा, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले लोगों के बीच संवाद और समझ भी मजबूत होगी।